जांच अधिकारी (आइओ) द्वारा नोटिस जारी करने में प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर कमियों को उजागर करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है।

न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया की पीठ ने कहा कि जांच में शामिल होने के लिए बुलाने के संबंध में जारी किए गए बिना तारीख वाले नोटिस का गलत इस्तेमाल बाद में आरोपित पर जांच में नहीं शामिल होने का आरोप लगाने के लिए किया जा सकता है।

पीठ ने उक्त चूक को चौंकाने वाला बताते हुए संबंधित पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) को उचित कार्रवाई कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।

सुनवाई के दौरान पीठ को बताया गया कि याचिकाकर्ता साेनिया बंसल को जांच में शामिल होने के संबंध में जांच अधिकारी ने नोटिस जारी किया था। इस नोटिस में पेश होने का समय तो बताया गया था, लेकिन तारीख का जिक्र नहीं किया गया था। तारीख वाला कालम खाली छोड़ दिया गया था।

याचिका के अनुसार यह पूरा मामला याचिकाकर्ता महिला व दिल्ली सचिवालय में कार्यरत व्यक्ति के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। महिला का आरोप है कि उसके पति के उच्च पदों पर संपर्क हैं और वह उन्हें परेशान कर रहा है।

महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति की शिकायत पर अलीपुर थाना पुलिस ने प्राथमिकी की थी। हालांकि, सभी अपराध जमानती प्रकृति के होने के बावजूद भी जांच अधिकारी ने जमानत बांड स्वीकार नहीं कर रहा है और याचिकाकर्ताओं को लगातार परेशान कर रहा है।

याचिकाकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति ने उन पर हमला किया था और इस संबंध में पुलिस में पीसीआर शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। वहीं, जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तार करने का कोई इरादा नहीं था।

पीठ ने निर्देश दिया कि नोटिस के माध्यम से निर्देश दिए जाने पर याची जांच में शामिल हो और अगली सुनवाई की तारीख तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाए। मामले पर अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी।

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